मार्शल आर्ट काला सीखने वाले भारतीय बोधिधर्म का इतिहास – Bodhidharma Stories

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दोस्तो आप मे से कितने लोंग बोधिधर्म को जानते हो अगर आप अपने भारत देश के रहने वाले बोधिधर्म के बारे मे नहीं जानते तो आप इस पोस्ट bodhidharma Stories को जरूर पढे जिससे आपको बोधिधर्म के इतिहास और बोधिधर्म की कहानी के बारे मे पता चल सके।

दोस्तो अपने सायद शाओलिन टेम्पल के बारे मे जरूर ही सुना होगा लेकिन क्या आपको यह पता की दुनिया के सबसे बड़े मार्शल आर्ट के स्कूल शाओलिन मे एक भारतीय की पुजा होती है इन भारतीय का नाम आप सब नहीं जानते होंगे लेकिन सायद अपने चिन्नई vs चाइना फिल्म जरूर देखी होगी जिसमे आपको बोधिधर्म के बारे मे बताया है।

यह बोधिधर्म वही भारतीय बौद्ध धर्म के प्रचारक और मार्शल आर्ट के जनक है जिन्होने  पूरे चीन को मार्शल आर्ट की काला मे निपुड़ बनाया, लेकिन आज हम सब भारतीय इन्ही महान पुरुष को भूलते जा रहे इस लिए आज हम एक पोस्ट बना रहे जिसमे आपको हम bodhidharma Stories के बारे मे बताने जा रहे है।

बोधिधर्म का इतिहास ( bodhidharma history )

बोधिधर्म का जन्म साउथ इंडियन के पल्लव साम्राज्य मे कांचीपुरम के राजा सुगंध के घर मे हुआ था, वह राजा सुगंध के तीसरे पुत्र थे और उन्होने अपनी छोटी आयु मे ही अपना साम्राज्य छोड़ कर एक भिझुक बन गए।

बोधिधर्म ने 22 वर्ष मे ही बौद्ध धर्म का ज्ञान प्राप्त किया और बाद मे वह धायन बौद्ध का धर्म को अध्यान करने वाले 28 वे पुरुष बने जिसके बाद वह एक दूत के रूप मे चीन के तरफ जाने लगे।

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बोधिधर्म ने ही भारत मे सबसे पहले हथियार बंद लड़ने की काला ( जिसको आज आधुनिक समय मे हम मार्शल आर्ट के नाम से जाना जाता ) को लाने वाले पहले व्यक्ति थे।

चीन , जापान , कोरिया  मे मार्शल आर्ट व बौद्ध धर्म को लाने वाले पहले व्यक्ति बोधिधर्म ही थे, जिसके बाद उन्होने शाओलिन टेम्पल के सभी भिझुक को मार्शल आर्ट की काला और शारीरिक ज्ञान दिया जिसके बाद यह शाओलिन कुंग भू के नाम से जाना जाने लगा।

चीन के लोंगों को बोधिधर्म और उनके द्वारा सिखाई गई सारी चीजे बहुत ही पसंद आने लगी जिससे चीन और जापान के लोंगों ने उनको प्यार से धमू के नाम से जानने लगे और उनकी मृत्य के बाद चीन के लोंग उनकी पुजा भी करने लगे।

चीन की इतिहास मे पाई जाने वाली कथाओ व ग्रंथो मे कई जगह बोधिधर्म का बर्णन किया गया और उसमे बताया गया की बोधिधर्म के उपदेश व शिझाये ध्यान व लंकवनतार सूत्र पर आधारित थी।

बोधिधर्म के गुरु  ( bodhidharma Teacher )

बोधिधर्म को बचपन से ही शाही राज व राजमाल जीवन मे कोई रुचि नहीं थी उन्हे केवल बचपन से ही बौद्ध धर्म मे रुचि होने के कारण उन्होने गुरु कश्यप को अपना अदरणीय गुरु माना और फिर उन्ही से उन्होने बौद्ध धर्म का ज्ञान लिया

बोधिधर्म ने बचपन मे ही अपना सारा राज पाठ त्याग कर एक अपने गुरुओ के साथ एक बौद्ध भिझु का जीवन व्यतीत किया और उन्ही गुरु के साथ उन्होने बौद्ध धर्म के उपदेशो का पालन करना सीखा।

बोधिधर्म ने 22 साल की उम्र मे ही सभी तरह के उपदेशो और बौद्ध धर्म का पूरा तरह ज्ञान प्राप्त कर लिया और फिर उन्होने अपने गुरु के बताए उपदेश के अनुसार पूरे भारत मे बौद्ध धर्म का प्रचार – प्रसार करने लगे।

बुद्धिधर्म ने अपने गुरु के मृत्यु के बाद अपना मठ छोड़ दिया और फिर वह अपने गुरु कश्यप के आदेश के अनुसार वह चीन देश के तरह बौद्ध धर्म का प्रचार – प्रसार करने निकल गए।

3 बर्ष के कड़ी महनत के बाद बोधिधर्म चीन के एक छोटे से गाव मे पाहुचे और उस गाव मे उन्होने बौद्ध धर्म का खूब प्रचार किया, जिसके बाद उन्होने उस गाव मे ही मार्शल आर्ट की सुरुवात की जिसको आज शाओलिन टेंपल के नाम से सभी देश जनता है।

चीन देश मे मार्शल आर्ट और आयुर्वेद पद्धति की निव सबसे पहले बोधिधर्म ने ही राखी और इसी बात से खुस होकर चीन वाले ने बोधिधर्म को प्यार से धमू कह कर बुलाने लगे।

आज भी चीन मे आपको बोधिधर्म की मूर्ति देखने को मिल सकती और दुनिया का सबसे बड़े मार्शल आर्ट का स्कूल शाओलिन टेम्पल मे आज भी सभी लोंग बोधिधर्म की पुजा करते है, अब आप bodhidharma Stories मे आगेबोधिधर्म की चीन यात्रा के बारे मे पढ़ेंगे

बोधिधर्म की चीन यात्रा ( bodhidharma journey to China )

bodhidharma Stories ने अपने गुरु के आखिरी आदेश के अनुसार भारत से चीन के लिए प्रस्थान करना चालू किया लेकिन भारत से चीन का रास्ता कम नहीं था इस लिए उन्हे भारत से चीन पाहुचने मे ही 3 बर्ष का समय लग गया।

चीन यात्रा के दौरान बोधिधर्म ने अपने साथ केवल एक घोडा ही रखा इसके अलावा उन्होने किसी भी प्रकार की कोई सुरझा नहीं ले गए और आखिर कर 3 बर्ष के बाद वह चीन के एक छोटे से गाव मे पाहुच ही गए।

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लेकिन बोधिधर्म चीन किस रास्ते से पाहुचे यह किसी भी ग्रंथ मे नहीं लिखा लेकिन एक साउथ की मूवी चिन्नई vs चाइना ने बोधिधर्म को एक असव के साथ पैदल यात्रा करता हुआ दिखाया है अब आप bodhidharma Stories मे आगेबोधिधर्म की चीन मे प्रवेश के बारे मे पढ़ेंगे

चीन मे बोधिधर्म का प्रवेश ( bodhidharma Enter In China )

अपने गुरु के बताए उपदेश के अनुसार बोधिधर्म चीन पाहुचे और वहा उन्होने ज़ोर सोर से बौद्ध धर्म का प्रचार करना चालू किया लेकिन जब उन्होने प्रचार सुरू किया तो कभी गाव के भिझु ने उनका काफी बिरोध किया।

लेकिन बोधिधर्म ने किसी भी प्रकार से अपने प्रचार – प्रसार को कम नहीं किया लेकिन गाँव के लोंग उनके इस धर्म के बारे मे किसी भी प्रकार का कोई ज्ञान नहीं लेना चाहते थे।

तब बोधिधर्म ने बताया की बौद्ध धर्म मे आपको केवल शास्त्रो और शिझाओ का एक अच्छा ज्ञान मिलेगा लेकिन इस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए आपको खूब कठिन परिश्रम करना पड़ेगा।

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लोंगों के काफी विरोध के बाद बोधिधर्म ने बौद्ध धर्म के एक नए तरीके से समझने की कोसिस की जिसमे उन्होने गौतम बुद्ध के बारे मे कम बताया लेकिन उसके बाद भी लोंगों ने उनका खूब विरोध किया, इस विरोध के कारण ही बोधिधर्म ने लुओयोंग प्रांत को छोड़ कर हेनान प्रांत के तरफ अपना कदम बढ़ाया और इसी के साथ शाओलिन टेम्पल की भी सुरुवात हुई।

लेकिन जब बोधिधर्म ने हेनान प्रांत मे प्रवेश किया तब भी उन्होने एक अच्छे और जन जन तक बौद्ध धर्म के ज्ञान को पाहुचने के लिए सोचा तो वह के लोंग भी उनका विरोध करने लगे।

सबसे पहले बोधिधर्म एक मठ शाओलिन मे पाहुचे लेकिन वहा पर भी सभी लोंग उनका विरोध करने लगे और फिर उन्होने उनको वहा से भागा दिया, लेकिन तभी बोधिधर्म ने किसी भी प्रकार की कोई भी घ्रणा नहीं की और वह एक गुफा मे चले गए।

उस गुफा मे बोधिधर्म ने 9 साल तक कठिन तपस्या की और उस कठिन तपस्या के बाद भी बोधिधर्म के शरीर पर किसी भी प्रकार की कोई भी बदलाव नहीं आया जिसे देख कर सभी भिझु ने उनको शाओलिन मे प्रधानाचार्य की उपाधि दी।

जब बोधिधर्म ने शाओलिन मे प्रवेश किया तब से ही उन्होने सभी भिझुओ को आतम रझा और कठिन तप के बारे मे बहुत ही अच्छा ज्ञान दिया।   

मार्शल आर्ट की सुरुवात ( bodhidharma Kung Fu )

चीन मे मार्शल आर्ट की निव रखने वाले पहले व्यक्ति बोधिधर्म है, लेकिन आधुनिक भारत मे मार्शल आर्ट की निव रखने पहले भारतीय महाऋषि अगस्त्य और भगवान श्री कृष्ण जी थे, शास्त्रो के मुताबिक महा ऋषि अगस्त्य ने सबसे पहले कलरीपटु जैसे बिना हथियार के लड़ने वाले काला की सुरुवात की थी।

लेकिन bodhidharma Stories शास्त्रो मे लिखा की भगवान श्री कृष्ण ने भी कलरीपटु की सुरुवात की लेकिन भगवान श्री कृष्ण जी के कलरीपटु मे बिना हथियार व हथियार बंद दोनों ही तरह की काला थी इसके बाद यह काला भगवान श्री कृष्ण जी ने महा ऋषि अगस्त्य को और महा ऋषि जी ने बोधिधर्म को यह काला सिखाया।

ग्रंथो मे लिखा की एक बार शाओलिन के पास एक गाँव मे कुछ हथियार बंद लुटेरे आ गए और वह लुटेरे गाँव वालो को जान से मरने लगे तभी बोधिधर्म वह पाहुचे और उन्होने अपनी अनूठी काला से उन सभी लुटेरो को बिना हथियार से ही सामना किया।

इसी के बाद सभी गाँव वालो ने बोधिधर्म को अपना गुरु मन लिया और उनसे इस काल को सीखने की ईझा करने लगे और फिर बोधिधर्म से इस काला को सभी गाँव वालों को सिखाया जिससे वह अपनी आत्मा रझा कर के बच सके।

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इसी तरह बोधिधर्म ने भारत के बाद चीन को मार्शल आर्ट की काला की एक नई दिशा दिखाई जिसके बाद वह यही नहीं रुके बल्कि वो इस काला को और भी आगे ले गए और चीन के अलावा भी कई देश मे बौद्ध धर्म और मार्शल आर्ट की काला का प्रचार – प्रसार किया।  

बोधिधर्म चिकित्सा की विधा  ( bodhidharma Medical Knowledge )

बोधिधर्म के पास शास्त्रो के ज्ञान और मार्शल आर्ट की पावर के साथ – साथ औषधियो को भी भरपूर्ण ज्ञान था, उन्होने अपने जीवन के कई साल जंगलो मे बिताए जिस कारण उन्हे हर एक जड़ व पेड़ का भरपूर्ण ज्ञान था और इसी ज्ञान के साथ उन्होने कई लोंगों का इलाज व कई लोंगों को इस काला के बारे मे भी बताया।

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बोधिधर्म के इस औषधि को पहचाने वाली काला को जानने के लिए कई चीन के हर भाग से कुछ व्यक्ति आए जिन्होने बोधिधर्म से इस काला को सीखा और फिर वह इस काला को सीख कर अपने देश मे चले गए।

बोधिधर्म की मृत्यु  (  bodhidharma Death )

बोधिधर्म की मृत्यु के कारणो का बर्णन हर ग्रंथो मे अलग – अलग किया गया लेकिन कुछ ग्रंथ करो का कहनना की बोधिधर्म की मृत्यु जहर खाने से हुई थी।

इस जहर खाने के पीछे भी एक कहानी यह है की जब बोधिधर्म पहली बार चीन पाहुचे तो वह एक गाँव मे गए जहा गाँव के लोंगों की भविस्य वाणी के हिसाब से उनके गाँव पर एक संकट आने वाला था तब गाँव वालों ने बोधिधर्म को ही अपना संकट समझा और फिर गाँव वालों ने उनको संकट समझ कर भागा दिया।

लेकिन असली संकट गाँव पर boधिधर्म के जाने के बाद आया और तब बोधिधर्म ने उनको इस संकट से निकाला जिसके बाद गाँव के लोंग उनको भगवान मानने लगे और उनसे अपना ज्ञान लेने लगे।

लेकिन कुछ समय के बाद बोधिधर्म ने या सोचा की अब मैंने अपने गुरु के बताए सारे उपदेशो का पालन करके लोंगों के अंदर बौद्ध धर्म का विस्तार किया अब सायद मेरा काम पूर्ण हुआ अब मुझे सायद अपने वतन लौट जाना चहाइए।

लेकिन उसी समय गाँव के लोंगे ने एक भविस्य वाणी की जिसमे उन्होने देखा की अगर धमू उनके देश से चले गए तो उनके ऊपर एक संकट आ जाएगा इसी कारण गाँव वालों ने बोधिधर्म के खाने मे जहर मिला दिया और उनको दे दिया, लेकिन जब वह खाना बोधिधर्म को दिया गया तब उन्होने तुरंत ही जान लिया की इस खाने मे जहर है।

अब उसके बाद उन्होने इस वजह का कारण पूछा गाँव वालों से तब सभी गाँव वालों ने जवाब दिया की अगर उनका शरीर इसी गाँव मे रहेगा तब उनके देश मे किसी भी प्रकार की कोई समस्या व बीमारी नहीं रहेगी, बोधिधर्म ने गाँव वालों की इस बात को मान लिया और उन्होने उस खाने को खा कर अपनी जान दे दी और इसी प्रकार एक महान मार्शल आर्ट के जनक की मृत्यु हो गई।

Conclusion

आज इस पोस्ट bodhidharma Stories मे अपने बोधिधर्म के इतिहास और उनके द्वारा सिखाये मार्शल आर्ट की काला के बारे मे सीखा और आप ने देख की किस तरह एक राजा जिन्होने बचपन मे ही अपना सब कुछ छोड़ कर अपने गुरु को ही अपना सब कुछ मन कर बौद्ध धर्म का ज्ञान लेने लगे और बाद मे किस तरह उन्होने चीन मे इस काला का प्रचार किया और लोंगों को मार्शल आर्ट की एक नई काला से रुबा रु भी कराया।

अब आप हमे यह बताए की आपने अभी से पहले बोधिधर्म के बारे मे कब सुना था, क्योकि अपमे से बहुत से ऐसे लोंग ऐसे होंगे जिनको चाइना के फिल्म बहुत अच्छी लगती लेकिन इनको कभी यह नहीं पता की चीन को मार्शल आर्ट सीखने वाला कौन था।

अब अगर आपको यह पोस्ट bodhidharma Stories अच्छी लगी हो तो आप हमे कमेंट के माध्यम से एक धन्यवाद भीज सकते है, इसके अलावा अगर आपका कोई सवाल हो तो आप हमे कमेंट भी कर सकते है।

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