चंदगुप्त को हराने वाले धननंद का इतिहास – Dhananand In Hindi

Dhananand In Hindi
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पाली ग्रंथ के अनुसार सम्राट धननंद ( Dhananand ) मगध राज्य के शक्तिशाली व अलोकप्रिय राजाओ मे से एक थे क्योकि उनके साम्राज्य मे गरीबी व लच्चारी , कुटिनीति , चोरी – चमारी थी और इन सभी का सबसे बढ़ा कारण मगध साम्राज्य के लोंगों की कार्यकुशलता व श्रम करने की झमता आदि।

ग्रंथ के अनुसार मगध साम्राज्य की झेत्र सीमा व्यास नदी तक फैली थी और इस साम्राज्य के पास सैनिक शक्ति भी बहुत अधिक थी ! जिस कारण से सिकंदर जो की एक बहुत ही शक्तिशाली राजा थे उनके सैनिक ने भी इस नदी को पर कर धननंद के सैनिक से युद्ध करने का न सोचा।

पाली ग्रंथ के अनुसार नन्द साम्राज्य मे नौ नंदों और उनसे संबन्धित सभी जानकारी के बारे मे पता लगता है! इस ग्रंथ के अनुसार यह पता लगा की नंदबंश को चलने वाले 9 राजा थे और यह सभी राजा एक ही माता के पुत्र थे, इन सभी भाइयो मे से सबसे छोटे भाई धननंद थे।

धननंद का जीवन परिचय ( Dhananand History )

ग्रंथो के अनुसार धननंद के बारे मे यह पता लगा की यह बहुत ही अत्याचारी व भोली – भली जनता पर अपने सैनिक का बल दिखाकर पैसे लौटने वाला और अपनी जनता के ऊपर अधिक टैक्स लगा कर पैसे लौटने वाला राजा था

धननंद के अंदर धन को इक्कट्ठा करने की खूब इच्छा थी, इसी इच्छा के कारण धननंद ने अपने राज्य की जनता को खूब परेशान किया और उनकी कमाई पर अधिक से अधिक टेक्स भी लगाया।

Dhananand In Hindi
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जब धननंद का इससे भी पेट न भरा तब उसने अपने सैनिक बल की ताकत से अपने आस पास के सभी छोटे राज्यो को हथियाने की इच्छा से उनको युद्ध की ललकरता था, कभी कभी तो कुछ छोटे गाव व राज्य अपने धन को उसके हवाले कर देते थे।

धननंद के इस अत्याचार को उस समय के कुछ लेखको ने अपने कुछ खास किताबों मे भी इसका वर्णन किया जिससे इस बात को छूट लाया नही जा सकता की धननंद एक क्रूर और अत्याचारी राजा हुआ करता था।

धननंद का असली नाम

धननंद का असल ( Dhananand Real Name ) ने कभी धननंद था ही नहीं बल्कि उसका यह नाम उसकी जनता ने रखा था. इस नाम को रखने के पीछे यह कारण था की धननंद को अपने पैसे से बहुत प्यार था और इसी के कारण मगध राज्य की जनता ने उसका नाम धननंद ( धन का लोभी ) रखा जिसका मतलब था।

पाली ग्रंथ के अनुसार धननंद का असली नाम अग्रम्स था जो की धननंद के सबसे बड़े भाई महापद्मानन्द का दूसरा नाम था. धनन्द के इस नाम की सच्ची पूक्ति किसी भी ग्रंथ मे नहीं मिलती है लेकिन कुछ ग्रंथो मे धननंद का यह नाम समान पाये जाने की वजह से इसका नाम यह रखा गया।

घननंद के सैनिको को संख्या

धननंद का मगध साम्राज्य बहुत ही बड़ा होने के कारण ही धननंद के पास अधिक सैनिक बल था. यह सभी सेना शक्ति धननंद को विरासत मे मिली और इसी विरासत मे मिली सेना के खौफ से ही सिकंदर जैसा जवाब्ज राजा के सैनिक दर के मारे इस मगध साम्राज्य मे प्रवेश नहीं कर पाये।

इतिहास करो की माने तो हमे यह पता लगता की धननंद के पास सेना मे कुल 2 लाख पैदल सैनिक , 20 हजार घोडा सवार , 2 हजार रथ , 3 हाथी थे. जब इस बात की खबर सिकंदर के सैनिक को लगी तो वह सब इसी डर के मारे ही व्यास नदी को नहीं पर करे।

धननंद की दौलत

धननंद के पास बहुत सारी दौलत थी इसका बर्णन आपको कई किताबों और पुराने इतिहास के पानो मे मिल सकता है. इसके अलावा आपको बता दे की धननंद के पास इतनी सारी दौलत होने के कई कारण उसकी विरासत और उसका इतना बढ़ा साम्राज्य था।

Dhananand को अपने पैसे को छुपा का रखने की आदत भी थी और इस बात का सबूत आपको तमिल के इतिहास के पन्नो मे मिल सकता है, जिसमे यह बताया गया की धननंद के पास कुल 99 करोड़ सोने के सिक्के थे जिसे धननंद ने गंगा नदी के अंदर किसी चट्टान मे एक गुफा मे छुपाया था।

धननंद द्वारा चाणक्य का अपमान

चाणक्य जब पटलिपुत्र आया तब वहा पर धननंद का राज था, चाणक्य के आने के कुछ ही दिन पहले धननंद सुधार चुका था और उसने अपने धन के लाभ को छोड़ कर अब दान – पुण्य करने लगा था. इस चीज को ही देख कर चाणक्य को धननंद पसंद आया।

लेकिन धननंद द्वारा चाणक्य का अपमान की घटना कुछ इस प्रकार हुई. एक बार धननंद ने अपने राज्य मे अक संघ का निर्माण किया जिसका मकसद था लोंगों की सेवा करना, इस संघ को ब्राह्मण और संघ के सदस्यो मे बटा गया।

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Image Source – https://www.jansatta.com/

अब इस संघ मे चाणक्य को संघ समुदाय का अध्यझ चुना गया, लेकिन इस संघ मे चल रहे गति विधि राजा dhananand को पसंद नहीं आई और उसने इसी बात पर चाणक्य को इस संघ से निकाल दिया, तब चाणक्य ने इस बात का बदला लेने के लिए dhananand को श्राप दिया की उसका साम्राज्य पूरी तरह खतम हो जाएगा और यह कह कर वह एक साधू के वेश मे वहा से बच निकला।

धननंद और चन्द्रगुप्त के बीच युद्ध

जब चाणक्य ने अपने अपमान का बदला लेने के लिए एक ऐसे व्यक्ति की खोज की जो आगे चल कर चंदगुप्त बनाना और चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को इस लिए तैयार किया ताकि वह मगध साम्राज्य को पूरी तरह से खतम करके वहा की जनता को धननंद को अतयाचरों से बचा सके।

इसी बदले की नेत्र से चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को पूरी तरह से तैयार की और जब चन्द्रगुप्त बड़े हुये तब उन्होने अपनी सेना तैयार की और अपनी पूरी सेना के साथ मगध साम्राज्य के मध्य मे आक्रमर्ण कर दिया, लेकिन इस बार चन्द्रगुप्त की हर हो गई क्योकि चन्द्रगुप्त को यह नहीं पता था की धननंद के पास एक विशाल सैनिक समूह है।

इस हर के बाद चन्द्रगुप्त फिर से आक्रमण के नेत्र से अपनी सेना को तैयार किया और इस बार अपनी सेना मे उन्होने कई और राज्यो के राजा से संधि करके उनके सैनिक बल को अपनी सेना मे मिला लिया, जब चन्द्रगुप्त को लगा ली उनकी सेना अभी कम है।

तब चन्द्रगुप्त ने कश्मीर के राजा पर्वतक से संधि करके उनको अपने साथ सामील किया. इसके बाद चन्द्रगुप्त ने अपनी सेना मे यूनानी सेना और लुटेरे को भी सामील किया और जब चन्द्रगुप्त ने देखा की उसकी सेना धननंद से युद्ध के लिए पूर्ण है।

तब चन्द्रगुप्त ने चाणक्य की आज्ञा से आक्रमण का आदेश लिए और फिर चन्द्रगुप्त ने चाणक्य के बताए गए बातों के हिसाब से मगध राज्य के छोटे – छोटे राज्यो को जीता और फिर आखिरी मे पटलिपुत्र को पूरी तरह से घेर कर धननंद का जान से मर ( Dhananand Death ) दिया।

लेकिन कुछ ग्रंथो के हिसाब से यह भी कहा गया की चन्द्रगुप्त ने धननंद को मारा नहीं बल्कि उसे कुछ धन और अपने परिवार के साथ पटलिपुत्र को छोड़ देने को कहा और फिर आखिरी मे चन्द्रगुप्त खुद मगध साम्राज्य का राजा बन गया।

Conclusion

इस पोस्ट मे हमने आपको dhananand के बारे मे पूरा इतिहास बताया और आपको यह भी बताया की किस तरह चाणक्य ने अपने अपमान के बदला लेने के लिए चन्द्रगुप्त को तैयार किया और धननंद का बध करके मगध राज्य की भोली भली जनता को धननंद के अत्याचारो से बचाया।

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