स्वामी विवेकानंद का सम्पूर्ण जीवन परिचय – Swami Vivekananda

swami Vivekananda biograpgy
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Swami Vivekananda भारतीय संस्कृति की पहचान को विदेशो तक पहुचाने वाले स्वामी विवेकानंद जी भारतीय संस्कृतिइतिहास के प्रचंड ज्ञानी के रूप में जाने जाते है. इस लिए Swami Vivekananda जी ने नव युवा के बालको को एक नई राह दिखने के लिए योग , राजयोग , ज्ञानयोग नमक ग्रंथो का निर्माण किया.

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Image Credit – https://www.theweek.in

स्वामी विवेकानंद जी की इन ग्रंथो ने युवा को भारतीय संस्कृति और भारतीय इतिहास से परिचय कराया. जिसके बाद सभी युवा पीढ़ी के अन्दर एक नई चेतना उत्पन्न हुई जो आपको भारतीय इतिहास के पन्नो में देखने को मिल सकती है.

Swami Vivekananda जी ने इस समाज के सभी मनुष्य व बालको को अपने उपदेश व किताब के माध्यम से सफलता की रह पर बढ़ने की एक नई चेतना से रूबरू कराया.

        “जब तक जीना, तब तक सीखना, अनुभव ही जगत में सर्वश्रेष्ठ शिक्षक है”

Swami Vivekananda जी ने अपने उपदेश में कहा की मनुष्य को अपने पुरे जीवन में बिताये हर पल से कुछ न कुछ जरुर सीखना चाहिए. क्योकि इन बिताये हुए पल से ही आपको अपने जीवन में आगे बढ़ने का ज्ञान मिलेगा. जीवन में अधिक ज्ञान के लिए सबसे सर्वश्रेष्ठ आपके शिक्षक है.

भारत के इतोहस में जिन मनुष्यों को अपने जीवन में सफलता पाना था. उन्होंने स्वामी विवेकानंद को अपना परम आदर्श मन लिया. जिसके बाद उन्होंने Swami Vivekananda द्वारा बताये विचारो को अपने हार्ड मांस से बने शारीर में पूर्ण रूप से उतरा और इसी के बाद उन्हें अपने जीवन में पूर्ण रूप से सफलता मिली थी.

“एक समय में एक काम करो , और ऐसा करते समय अपनी पूरी आत्मा उसमे डाल दो और बाकी सब कुछ भूल जाओ”

इस तरह के सफलता पूर्ण विचारो को प्राप्त करने के लिए Swami Vivekananda जी ने अपने जीवन के कई साल विश्व के भ्रमण में लगा दिया. इस भ्रमण के दौरान Swami Vivekananda जी ने इस संसार उपस्थित सभी चीजो को बारीकी से समझा. फिर उन्होंने अपने गुरु के अध्यात्मिक ज्ञान से भी काफी कुछ सिखा और इसी के बाद उन्होंने आगे आने वाले युवा को अपने जीवन में सफल होने के लिए अपने उपदेश , विचार , सभा , किताब आदि को सम्भोधित किया.

Swami Vivekananda जी के विचारो व उपदेशो ने ही उन्हें एक महान महानायक बनाया. क्योकि Swami Vivekananda द्वारा बताये उपदेशो से भारत ही नहीं बल्कि पूरा विश्व भी प्रेरित होता है. इन्ही विचारो की मदद से Swami Vivekananda जी ने पुरे विश्व में भारत की संस्कृति को पूर्ण रूप से गौरव पूर्ण बनाया है.

Table of Contents

Swami Vivekananda की जीवनी – Swami vivekananda  biography in Hindi

पूरा नाम              –    नरेन्द्रनाथ विश्वनाथ दत्ता  
जन्म                              –        १२ जनवरी १९८६  
जन्मस्थान                      –        कलकत्ता  
पिता का नाम                 –         विश्वनाथ दत्त  
माता का नाम                –         भुवनेश्वरी देवी  
घर का नाम                    –          नरेंद  
मठवाशी के बाद नाम     –         स्वामी विवेकानंद  
भाई – बहन            –     
गुरु                   –     रामकृष्ण परमहंस  
शिक्षा                 –      बी . ए परीक्षा पास  
विवाह               –      नहीं  
संस्थापक            –      रामकृष्ण मठ                            
ग्रन्थ                 –      राज योग  
साहित्यिक योगदान    –       राज योग , कर्म योग  
मृत्यु                 –       ४ जुलाई १९०२  
मृत्यु स्थान           –        बेलूर , पचिम बंगाल  

स्वामी विवेकानंद का सम्पूर्ण जीवन परिचय  – swami Vivekananda biography

swami Vivekananda जी का वास्तविक नाम नरेन्द्र नाथ दत्त था. यह वेदान्त संस्था के एक विख्यात व प्रभावशाली गुरु भी थे. swami Vivekananda जी ने १८९३ ई में अमेरिका के शिकागो शहर में आयोजित विश्व धर्म महासभा सम्मलेन में भारत देश की तरफ से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व भी किया था.

स्वामी विवेकानंद के द्वारा ही भारत का अध्यात्मिक से परिपूर्ण वेदान्त दर्शन अमेरिका यूरोप द्वीप के हर एक देश में पूर्ण रूप से फैला था. क्योकि स्वामी विवेकानंद जी ने खुद ही विश्व के दो बड़े द्वीप अमेरिका व यूरोप ने भ्रमण करके लोंगो को वेदान्त दर्शन के रूबरू कराया था.

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स्वामी विवेकानंद के परम गुरु रामकृष्ण परमहंश जी थे. स्वामी विवेकानंद जी ने अपने जीवन का अधिक ज्ञान अपने गुरु से ही लिया. फिर बाद में अपने गुरु के आदेश अनुसार स्वामी विवेकानंद जी ने अपनी चेतना , ग्रन्थ , विचार आदि को नये पीढ़ी तक पहुचने के लिए रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी. आज के समय ने भी आप इस मिशन को काम करते हुए देख सकते है.

स्वामी विवेकानंद जी को अधिकतर लोंगो उनके द्वारा बोले गए भाषण के वजह से सभी लोग जानते थे. इस भाषण में स्वामी विवेकानंद जी अपने सुरुवाती लाइन में ही “ मेरे अमरीकी भाइयो व बहनों” से करते थे. स्वामी विवेकानंद जी इस शब्द से ही वहां पर बैठे सभी लोंगो का दिल जीत लेते थे.

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swami Vivekananda का जन्म कलकत्ता के एक बंगाली परिवार में हुआ था. बचपन से ही स्वामी विवेकानंद जी का मन पूर्ण रूप से आध्यात्मिकता की ओर मुडा हुआ था. जिस वजह से इन्होने रामकृष्ण परमहंश को अपना गुरु माना लिया.

स्वामी विवेकानंद जी अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस की बातो से खूब प्रभवित हुए. इन्ही के शरण में रहने के बाद स्वामी विवेकानंद जी ने जाना की हम “ मनुष्य की सेवा से ही परमात्मा की सेवा कर सकते है ” इसके बाद स्वामी विवेकानंद जी ने अपने गुरु के आदर्शो का पालन किया. जिसके बाद स्वामी विवेकानंद जी ने भारतीय उपमहाद्वीप के कई देशो का भ्रमण किया.

भारत में स्वामी विवेकानंद को एक सन्यासी देशभक्त के रूप में बना जाता है. इसके पीछे कारण यह की जब १८९३ में स्वामी विवेकानंद जी ने विश्व धर्म संसद में भारत के प्रतिनिधित्व करने सयुंक्त राज्य अमेरिका के लिए प्रस्थान किया. तब विवेकानंद जी हिंदी दर्शन के सिद्धांतो का प्रसार अमेरिका , यूरोप और इंग्लैंड के किया था.

स्वामी विवेकानंद जी के जन्मदिन को भारत में राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में भी बनाया जाता है.

स्वामी विवेकानंद का प्रारंभिक जीवन – swami Vivekananda History

  • स्वामी विवेकानंद का जन्म १२ जनवरी १८६३ में मकर संक्रांति के दिन कलकत्ता के एक कायस्थ परिवार में हुआ था.
  • स्वामी जी के पिता का नाम विश्वनाथ दत्त था, जो पेशे से कलकत्ता हाईकोर्ट के प्रसिद्ध वकील थे.
  • विवेकानंद जी का बचपन का नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था. लेकिन मठ वासी होने के बाद उन्होंने अपना नाम swami Vivekananda रख लिया.
  • स्वामी विवेकानंद के दादा का नाम दुर्गाचरण था.
  • स्वामी जी के दादा जी संस्कृत और फारसी के विद्वान थे. लेकिन २५ की उम्र में उन्होंने अपना सब कुछ त्याग कर साधू बन गए थे.
  • स्वामी जी की माता का नाम भुवनेश्वरी देवी था.
  • स्वामी जी के माता धर्मिक विचारो की थी और अपना अधिकांश समय देवी – देवता की पूजा में लगाती थी.
  • स्वामी जी ने अपने माता – पिता से मिले गुणों और संस्कारो से ही अपने आप को एक व्यक्तिगत आकार की तरफ मोड़ा था.
  • स्वामी विवेकानंद जी ने अपने बचपन के दिनों मे अपने साथियों के साथ मिल कर खूब शरारत की है.
  • स्वामी जी को अपने बचपन के दिन से ही वेदों – पुराणों का भरपूर ज्ञान था. इसके पीछे सबसे बड़ा कारण इनकी माता थी. क्योकि इनकी माता एक धार्मिक खयालो की थी और वह हर समय अपने घर में पूजा – अर्चना किया करती थी.
  • स्वामी जी को अपने बचपन के दिन से ही गीता , रामायण , पुराणों की कथा सुनना बहुत पसंद था.
  • स्वामी जी का मन बचपन से ही व्यक्तिगत व धार्मिक ख्यालो में डूबा रहता था. क्योकि इनका बचपन पूर्ण रूप से व्यक्तिगत व धार्मिक ख्यालो में बिता था.
  • स्वामी जी व्यक्तिगत के अलावा बचपन से ही बुद्धिमान भी थे. वह हमेशा पुराणों को पढ़ कर उनसे जुड़े सवालो को अपनी माता व पंडित जी से पूछा करते थे.
  • स्वामी विवेकानंद जी की इन्ही सब चीजो ने उन्हें एक महापुरुष बना दिया. आज के समय में भी पूरी दुनिया स्वामी विवेकानंद के बताये उदेश को पालन करके अपने जीवन को सफल बनाते है.

स्वामी विवेकानंद की शिक्षा – Swami vivekananda education

  • स्वामी विवेकानंद जी की प्रारंभिक पढाई १८७१ ई में ईश्वर चन्द्र विद्यासागर मेट्रोपोलिटिन संस्था से शुरू हुई थी.
  • सन् १८७७ मे स्वामी जी के पिता को किसी काम के चलते रायपुर में रुकना था. तब वह अपने परिवार के साथ रायपुर चले गए. जिससे स्वामी जी की पढाई में थोडा फेर बदल हुआ.
  • सन् १८७९ में जब इनका परिवार दुबारा से कलकत्ता में रहने आया. तब स्वामी जी ने अपने कॉलेज की प्रेसिडेंसी परीक्षा के प्रथम अंक अर्जित किया था.
  • स्वामी जी अपने कॉलेज के समय में दर्शन , धर्म , इतिहास , सामाजिक विज्ञानं , कला और साहित्य जैसे विषयो ने अधिक रूचि थी.
  • स्वामी जी को पढाई के साथ – साथ वेद , पुराणों , रामायण , महा भारत , भगवद गीता आदि धार्मिक किताबो को पढ़ाने में अधिक रूचि थी.
  • स्वामी जी अपने कॉलेज के दिनों में भारतीय शास्त्रीय संगीत में पूर्ण रूप से निपुण थे. इसके अलावा वह हमेशा अपने कॉलेज में होने वाले खेल – कूद और व्यायाम में भाग लिया करते थे.
  • विवेकानंद जी ने असेंबली इंस्टिट्यूट से पश्चिमी तर्क , पश्चिमी दर्शन और यूरोपीय इतिहास का अध्यन किया था.
  • स्वामी जी ने सन् १८८१ ई में ललित कला की परीक्षा उत्तीर्ण करके सन् १८८४ में अपनी कला स्नातक की मार्कशीट प्राप्त की थी.
  • स्वामी जी ने पढाई के बाद कई विदेशी के समाज कार्यो को पूर्ण अध्यन किया. इन अध्यन में उन्होंने इन लोंगो को ज्यादा बारीकी से समझा डेविड हयूम , इमैनल कांट , जोहान गोटलिब फिंच, बारुक स्पिनोजा , जोर्ज डब्लू एच हेजेल , आर्थर स्कुपन्हार और जॉन स्टुअर्ट मिल आदि.
  • स्वामी जी ने पश्चिम दर्शन के साथ – साथ बंगाली ग्रंथो का भी अध्यन किया था.
  • स्वामी जी ने १८६० में स्पेंसर की किताब “ एजुकेशन ” का हिंदी में अनुवाद भी किया था.

सम्मान भाव – स्वामी जी ने विषय में महासभा संस्था के प्रिंसिपल विलियम हेस्त्री ने कहा की “ मैंने इस विश्व के कई देशो में भ्रमण किया लेकिन मुझे स्वामी विवेकानंद जी जैसा प्रतिभा शाली व्यक्ति नहीं देखा ” जो इनके जैसा हो. यहाँ तक जर्मनी के विश्व विद्यालय के दार्शनिक छात्रों में भी मुझे स्वामी जी जैसा कोई नहीं मिला.

स्वामी विवेकानंद के गुरु रामकृष्ण परमहंश – Swami Vivekanand Teacher Ramkrushna

swami Vivekananda जी बचपन से ही बहुत बुद्धिमान व्यक्ति थे. इसी कारण वह कभी की किसी प्रश्न को पूछने में पीछे नहीं हटते थे. इसी के कारण उनके मन में सवाल पूछने की उत्सुक्त बहुत ही अधिक हो गई थी.

एक समय की बात थी जब स्वामी विवेकानंद जी महर्षि देवानंद नाथ से यह सवाल किया “ क्या अपने कभी ईश्वर को देखा है ” इस सवाल को सुनकर देवानंद जी चकित में पड़ गए. इसी के बाद देवानंद जी ने स्वामी विवेकानंद को रामकृष्ण परमहंस के पास ले गए.

” खुद को कमजोर समझना सबसे बड़ा पाप हैं “

स्वामी जी को रामकृष्ण परमहंश की बातो ने काफी प्रभावित किया, जिसके बाद स्वामी जी ने रामकृष्ण परमहंस को अपना गुरु माना लिया. इसके बाद स्वामी जी ने अपने गुरु के बताये मार्ग पर आगे बढ़ गए और लोंगो को हिंदी साहित्य से दर्शन कराया.

ramkrishna paramhans
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सन् १८८५ में रामकृष्ण परमहंश जी कैंसर जैसी भयानक बीमारी से पीड़ित हो गए. इस समय स्वामी विवेकानंद जी ने अपने गुरु की खुद सेवा की और इसी सेवा से गुरु और शिष्य का सम्बन्ध और भी गहरा हो गया. लेकिन राम कृष्ण परमहंश जी इस बीमारी से अभी भी मुक्त नहीं हुए थे.

करीब १ बर्ष के बाद राम कृष्ण परमहंश जी का १६ अगस्त १८८६ को गहरी बीमारी के साथ मृत्यु हो गई. इसी के बाद स्वामी जी ने अपने बदन पर एक एक गरुआ रंग का वस्त्र डाला और फिर निकल गए भारत के भ्रमण के लिए.

नरेन्द्र से स्वामी विवेकानंद नाम कैसे पड़ा – swami Vivekananda Real Name

सन् १८९३ में नरेन्द्र नाथ बैंग्लोरू में उपस्थित मठ से भारत का भ्रमण करने और वेदों का प्रसार – प्रचार करने निकले थे. तब इसी बिच इनकी मुलाकात ४ जून १८९१ को माउन्ट अबू के खेतड़ी रजा अजीत सिंह से हुई थी.

रजा अजीत सिंह ने स्वामी विवेकानंद जी के ज्ञान के भंडार के बारे में खली अभी तक सुना ही था. लेकिन जब रजा अजीत सिंह ने पहली बार स्वामी विवेकानंद जी से बात की तब उन्होंने जाना की सच में विवेकानंद जी ज्ञान के भंडार है. इसी चीज से रजा अजित सिंह काफी खुस हुए और फिर उन्होंने स्वामी विवेकानंद जी को अपने राज्य में आने के लिए आमंत्रित भी किया था.

Raja Ajit Singh
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नरेन्द्र ने इस निमार्त्रण को स्वीकार किया और फिर 7 अगस्त १८९१ में भारत के भ्रमण के दौरान वह राजस्थान के खेतड़ी राज्य पहुचे. इस राज्य में रजा अजित सिंह ने स्वामीजी काफी फव्य स्वागत किया और फिर उनको अपने साथ रखा.

इस बिच स्वामी जी ने भी अपना काफी समय वह बिताया और तभी रजा अजित सिंह ने नरेन्द्र को राजस्थान की पगड़ी बंधना सिखाया. इसके बाद अजित सिंह ने नरेन्द्र से अनुरोध किया की वह भी राजस्थान की पोषक को पहने. इस बात पर स्वामी जी ने तुरंत हामी भरी और तभी से स्वामी जी ने अपने सर पर पगड़ी बंधना सुरु किया.

इसके बाद रजा अजित सिंह ने स्वामी जी का नाम नरेन्द्र से बदल कर “ विवेकानंद ” रख दिया.

रामकृष्ण मठ की स्थापना – ramakrishna math

स्वामी विवेकानंद जी ने अपने गुरु राम कृष्ण परमहंश की मृत्यु के बाद एक राम कृष्ण संघ की स्थापना की थी. इस संघ में स्वामी जी अपने गुरु के आदर्शो को दुसरे शिष्यों को सिखाते थे. इसी के बाद राम कृष्ण संघ का नाम बदलकर रामकृष्ण मठ रख दिया गया था.

ramakrishna math
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इसी तरह रामकृष्ण मठ की स्थापना स्वामी विवेकानंद जी के द्वारा हुई थी. इसके बाद ही स्वामी जी ने अपना जीवन को त्याग कर एक सन्यासी का जीवन बिताने लगे और भारत देश में वेदों का प्रसार – प्रचार करने के लिए भ्रमण करने लगे.

विश्व धर्म सम्मेलन – swami Vivekananda Chicago Speech

सन् १८९३ में स्वामी विवेकानंद जी सयुक्त राज्य अमेरिका के शिकागो शहर में हो रहे विश्व धर्म सम्मेलन में हिस्सा लेने पहुचे. इस स्थान पर स्वामी जी ने देखा की हर देश के धर्म गुरु अपने धार्मिक ग्रंथो के साथ पहुचे थे. सभी ने अपनी पुस्तक को एक टेबल पर रख दी.

भारत देश की धार्मिक वर्णन के लिए भी वह पर श्री मद भगवत गीता राखी हुई थी. लेकिन सम्मलेन में उपस्थित सभी व्यक्ति इस पुस्तक पर ध्यान नहीं दे रहे थे और उल्टा उसी पर हसी कर रहे थे. लेकिन तभी स्वामी जी मंच पर उठ खड़े हुए और फिर उन्होंने गीता के हर एक श्लोक को बारीकी से समझाया, जिसके बाद वह पर बैठे सभी लोंग ने तालियों को बरशात कर दी.

स्वामी जी ने अपने स्पीच में लोंगो को जीने , शांति बनाये रखने की , सफलता प्राप्त करने के आदि विषय में बताया. इसके बाद उन्होंने राष्ट्रवाद और सम्प्रय्दिकता पर की प्रहार करते हुए दो चार शब्द करे थे. इसी के बाद भारत की एक पुरे विश्व ने एक नई छवि बनी और स्वामी जी को एक नई पहचान मिली थी.

लेकिन स्वामी जी ने विश्व धर्म सम्मलेन में भारत देश की छवि बनाने के काफी मुश्किलो का सामना किया. क्योकि जब स्वामी जी वह पहुचे तब उन्हें यूरोप – अमरीकी लोंगो की वजह से मंच पर बोलने का मौका नहीं दिया जा रहा था. लेकिन अमेरिकी प्रोफ़ेसर की प्रयास के वजह से स्वामी जी को अपनी बात कहने का कुछ समय मिला. जिसके बाद तो आप सब जानते ही है की किस तरह स्वामी जी ने लोंगो को ताली बजने पर मजबूर कर दिया था. 

Chicago Speech

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swami Vivekananda image Image Credit – https://english.sakshi.com

स्वामी विवेकानंद की यात्रा – Swami vivekananda yatra

स्वामी विवेकानंद जी ने अपने गुरु रामकृष्ण प्रम्हंश की मृत्यु के बाद २४ बर्ष की आयु में अपने शरीर पर गेरुआ रंग का वस्त्र धारण किया. जिसके बाद स्वामी जी अपने ज्ञान और गुरु से मिले आदर्शो को फ़ैलाने के लिए भारत में यात्रा सुरु की और फिर बाद में यह यात्रा भारत से विदेश तक पहुची. इस यात्रा के दौरान स्वानी विवेकानंद जी ने भारतीय दर्शन का खूब प्रचार – प्रसार किया.

स्वामी विवेकानंद जी की प्रमुख यात्रा

  • विवेकानंद ने अपनी पहली यात्रा ३१ मई १८९३ ई में जापान के नागासाकी , कोबे , योकोहमा , ओसका , क्योटो , टोक्यो के अलावा कई और शहर में भ्रमण किया.
  • जापान के बाद स्वामी जी चीन और कनाडा में भ्रमण किया.
  • सन् १८९३ में स्वामी जी ने अमेरिका के शिकागो शहर के लिए प्रस्थान किया. यहाँ पर स्वामी जी को विश्व धर्म सम्मलेन में सामिल होना था.
  • इस सम्मेलन में स्वामी जी ने भारत के धर्म पुस्तक के बारे में लोंगो को दो चार बाते बताई थी.
  • इसके बाद स्वामी जी का अमेरिका में भव्य स्वागत हुआ और उसी के बाद वह अमेरिका में ३ बर्ष तक रुके.
  • अमेरिका में लोंगो का प्यारा देख स्वामी जी ने अमेरिका ले लोंगो को भारतीय विज्ञानं से रूबरू करने के लिए रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी.
  • अमेरिका के मिडिया वालो ने स्वामी जी के व्यक्तित्व – शैली को देख कर “ साईकालाय्निक हिन्दू ” नाम से पुकारने लगे.               
  • स्वामी विवेकानंद जी ने भारत की छवि के लिए काफी कुछ किया.

रामकृष्ण मिशन की स्थापना – Ramakrishna Mission Established

स्वामी विवेकानंद जी जब १८९७ में वापस भारत के कलकत्ता शहर ए तब उन्होंने भारत के लोंगो के लिए रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी.  इसके तहत भारत के सभी बच्चो के लिए बहतर शिक्षा के लिए स्कुल , खाने के लिए रशोई घर , इलाज के लिए अस्पताल , साफ – सफाई आदि चीजो की सुरुवात हर झेत्र में की थी.

Vivekananda Hospital
Vivekananda Hospital
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स्वामी जी ने इस मिशन के तहत लोगो को सभी नवजवानों को सफलता की ओर बढ़ने के लिए उनके परम आदर्श भी बन गए. सन् १८९८ में स्वामी जी ने बलेरू मठ की स्थापना की जिसमे भारतीय जीवन दर्शन को एक नया मोड़ दिया गया था. इस मिशन के तहत कई लोंगो को काफी सफलता मिली क्योकि उनको उनके ज्ञान से दर्शन कराया गया.

आज के समय में भी आपको स्वामी विवेकानंद के द्वारा चलाया गया मिशन में काम होता हुआ दिखाई देगा, इसके अलावा आपको भारत के कई राज्यों में आज भी स्वामी विवेकानंद द्वारा चलाया गया अस्पताल , स्कूल आदि देखने को मिल जायेगा.

मृत्यु – Swami vivekananda death

स्वामी विवेकानंद जी एक तेजस्वी और ज्ञान के सागर के परिपूर्ण व्यक्ति थे. इसके द्वारा बताये गए उपदेशो को लोंग आज भी अपना आदर्श मानते है. लेकिन स्वामी जी अपने जीवन के अंतिम दिनों में भी अपने आप को किसी भी परिस्थिति में रोका नहीं और अपने ज्ञान के भंडार को बढ़ने के लिए अपने जीवन के अंतिम समय ने यजुर्वेद का ज्ञान किया.

इसी के बाद स्वामी जे ने कहा की “ मुझे एक और विवेकानंद चाहिए ताकि हम जान सके की विवेकानंद ने अपने जीवन में क्या कार्य किया ” लेकिन इसी के बाद स्वामी जी ने अपने शरीर से अपनी आत्मा को अलग कर दिया.

एक शिष्य के अनुसार 8 जुलाई १९०२ को  स्वामी विवेकानंद जी अपने जीवन के आखरी दिन भी अपने सभी कामो को किया और फिर उन्होंने अपने आप को ध्यान में लीं किया. जिसके बाद उन्होंने एक समाधि ले ली और अपने प्राण की छोड़ दिया.   

इनकी मृत्यु के बाद इनकी चिता को बंग्लोरू के तट पर चन्दन की लकड़ी पर दह संस्कार किया. इनकी चिता को जिस तट पर रखा गया था वाही पर १६ बर्ष पहले इनके गुरु रामकृष्ण परमहंश का भी दह संस्कार हुआ था.

स्वामी विवेकानंद का शिक्षा की ओर कदम

स्वामी विवेकानंद जी ने मैकाले द्वारा प्रतिपादित अंग्रेजी शिक्षा का काफी विरोध किया, स्वामी जी का कहना था की यह अंग्रेजी शिक्षा बालक को केवल ऊपर से मजबूत बनती है, जिसमे बालक को अंग्रेजी बोंलाना , कपडे पहना , परीछा उत्तीर्ण करना सिखाया जाता है.

लेकिन वही हमारी भारतीय शिक्षा जो की हर बालक को ऊपर से निचे तक पूर्ण रूप से किसी काम को करने में निपूर्ण बनती है. इसके अलवा उन्हें हर परिस्थिति में अपने आप को सक्षम बनाने के बारे में सीखया जाता है. इस शिक्षा से लोंगो को पर्ण रूप से सर्वगुर्ण संपन्न बनाया जाता है.

लेकिन वही अपकी अंगेजी शिक्षा केवल आपको उपरी मजबूत बनती है, जिसमे आपका न तो जीवन संघर्ष के लिए तैयार किया जाता है , न आपका चरित्र निर्माण होता है, इसमें आपके मन में सेवा की भावना भी उत्पन्न नहीं होती है. इसमें न तो आपको शेर जैसा ह्रदय के उदार के विषय में पढाया जाता है. अब आप ही बताये की ऐसी शिक्षा का क्या महत्त्व है.

शिक्षा के दर्शन में स्वामी विवेकानंद का अनमोल विचार

  •       शिक्षा ऐसी हो जीमे बालक का मानसिक और शारीरिक दोनों ही विकास हो.
  •       शिक्षा ऐसी हो जिसमे बालक के मन , बुद्धि , सेवा का उदार हो.
  •       शिक्षा के लिए लड़का – लड़की किसी में कोई फर्क नहीं होना चाहिए.
  •        शिक्षा , गुरु गृह में प्राप्त की जाती है.
  •        पाठ्यक्रम में लौलिक तथा पर्लौलिक दोनों विषय का ज्ञान होना चाहिए.
  •        देश की तकनिकी सुरक्षा पर भी ध्यान दिया जाये.
  •       शिक्षा ऐसी मिले जो आपको जीवन में लड़ने की शक्ति प्रदान करे.

स्वामी विवेकानंद की कहानी – Swami Vivekanand Story

स्वामी विवेकानंद के जीवन में कई ऐसे भी समय भी थे जिनसे आपको कुछ नया सिखने को मिलता है. आइये देखते है.

पहली कहानी – एक बार स्वामी विवेकानंद जी गहरी नींद में सो रहे थे, तभी उनके पास रोता हुआ एक व्यक्ति आया और बोला की स्वामी जी मै अपने जीवन में काफी महनत करता हु लेकिन तभी मै अपने जीवन में सफल नहीं हो पता हु,

इस विषय में स्वामी जी न कहा की आप मेरे पलतू कुत्ते को जरा टहला कर आओ तब तक हम आपके समस्या का समाधान खोजते है, इसके बाद वह व्यक्ति कुत्ते को लेकर चला गया. कुछ समय बाद जब वह वापस आया तब वह कुत्ता बहुत हाक रहा था.

तब स्वामी जी ने उस व्यक्ति से पूछा की तुम इतना कम थके और यह कुता इतना ज्यादा कैसे, तब व्यक्ति ने कहा की मै तो सीधे चल रहा था. लेकिन यह कुत्ता मार्ग में इधर – उधर घूम रहा था, जिस कारण यह ज्यादा थक गया था.

तब स्वामी जी ने कहा की तुमको अपने समस्या का समाधान भी इसी चीज से मिल गया. क्योकि जब तुम अपने काम को करने के लिए बढ़ते हो तब तुम अपने काम पर ही फोकस करो न की इधर – उधर की चीजो पर तभी आपको सफलता मिलेगी.

शिक्षा आपको जीवन में सफल होने के लिए केवल अपने काम पर ही फोकस करना चाहिए.

स्वामी विवेकानंद का अनमोल वचन – Swami Vivekananda thought

स्वामी जी ने अपने आने वाली पीढ़ी को अपने जीवन में सफल होने के लिए कुछ खास अनमोल वचन कहे जोकि निम्न है –

  • उठो जागो और अपने लक्ष्य के पीछे तब तक पड़े रहो जब तक आपको सफलता न मिल जाये.
  • एक समय में एक ही काम को करो और उस काम को अपनी पूरी लगन के साथ करो.
  • किसी काम के सुरुवात में उसका काफी मजाक होता है लेकिन बाद में वह स्वीकार की जाती है.
  • एक अच्छा चरित्र कई ठोकरों के बाद होता है.
  • अपनों का होना ज्यादा नहीं, बल्कि अपनों में अपना पन होना जरुरी है.

 स्वामी विवेकानंद का योगदान व महत्त्व – Swami Vivekananda quotes

  • स्वामी विवेकानंद अपने गुरु रामकृष्ण परमहंश के सिखाये सिद्धांतो और दिखाए मार्गो पर पूर्ण विस्वास करते थे.
  • स्वामी जी मानवता धर्म को ही सबसे बड़ा धर्म मानते थे. जिसमे लोंगो की सेवा , भोजन , आदि सामिल था
  • स्वामी जी कहते थे की किसी भी देश के विकास के लिए पढाई , ज्ञान और देश की संस्कृति का होना बहुत ही जरुरी है.
  • स्वामी जी ने हिन्दू धर्म के अध्यात्मा के साथ आधुनिक विज्ञानं की महान अवश्यक समझा है.
  • अमेरिका में ही विवेकानंद जी ने रामकृष्ण के सिद्धांतो का प्रचार – प्रसार सुरु किया था.
  • स्वामी जी ने विश्व धर्म सम्मलेन में भारत के एक नै छवि बनाई थी.
  • जब स्वामी जी अमेरिका से वापस भारत अये तब उनका स्वागत बहुत ही धूम – धाम से हुआ था.
  • स्वामी जी ने ही राम कृष्ण मिशन की नीव राखी थी.
  • स्वामी जी जब भारत अये उन्होंने भारत में नई पीढ़ी के लिए कई चीज की सुरुवात की जैसे अस्पताल , स्कूल , भोजनालय आदि.
  • स्वामी जी ने उन लोंगो के विषय में कहा जो सबको अलग कर देते है की “ उन लोंगो से आप तुरंत दूर हो जाये क्योकि उनका स्वभाव ही ऐसा है वह कभी नहीं सुधरने वाले ”

स्वामी विवेकानंद के जीवन से जुड़े कुछ रोचक तथ्य – Swami Vivekananda life Facts

  • स्वामी विवेकानंद अपने  २४ बर्ष की उम्र में ही सन्यासी बनकर गेरुआ रंग धारण किया था.
  • स्वामी विवेकानंद जी बचपन से ही बहुत बुद्धिमान व शरारती भी थे.
  • स्वामी जी को बचपन से ही हर चीज के बारे में जानने की बहुत उत्सकता रहती थी.
  • स्वामी जी की उत्सकता ने ही उन्हें अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस के पास पहुचाया था.
  • स्वामी जी ने अपने गुरु के आखरी दिन में काफी सेवा की थी.
  • स्वामी जी सन १८९३ में भारत के अपनी यात्रा सुरु कर चुके थे.
  • ११ सितम्बर १८९३ में स्वामी जी ने शिकागो में अपना पहला भाषण विश्व धर्म सम्मलेन में दिया था.
  • स्वामी विवेकानंद के जन्म दिवस २१ जनवरी को पुर भारतवर्ष में “ युवा दिवस ” के रूप में मनाया जाता है. इसी दिन swami Vivekananda Jayanti भी मनाई जाती है.
  • ४ जुलाई १९०२ को स्वामी जी ने बंग्लोरू के मठ में अपना प्राण को त्याग दिया था.

स्वामी विवेकानंद की रचना – Swami Vivekananda Book

स्वामी विवेकानंद ने अपने पुरे जीवन में काफी किताब, पत्र , लेख लिखा है. इन सभी किताबो को लिखने का सिर्फ एक ही मकसद है, लोंगो को उनकी संस्कृति से रुबारु करना है. इन सभी किताबो में से कुछ खास किताब इस प्रकार है.

स्वामी विवेकानंद के नाम पर धरोहर

  • बेलूर मठ में स्वामी विवेकानंद और उनके गुरु राम कृष्ण परमहंश के का अमूल धरोहर मन गया है.
  • कन्याकुमारी के पर्यटन स्थल पर आपको स्वामी विवेकानन्द का स्मारक देखने को मिल सकता है.
  • अमेरिका में स्वामी विवेकानंद के नाम पर एक सड़क बनी हुई है.
  • स्वामी विवेकानंद के नाम पर आपको कई अस्पताल , स्कूल , भोजनालय आदि मिल जायेंगे.
  • मध्यप्रदेश में स्वामी विवेकानन्द के नाम पर एक विस्वविद्यालय है.
  • जम्मू में स्वामी जी के नाम पर एक अस्पताल है.
  • इन सभी के अलावा आपको पुरे विश्व में कई ऐसे चीज मिलेंगी जो स्वामी विवेकानंद से जुदा है.
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